Taif की सबसे पुरानी पारंपरिक कलाओं में से एक Al-Majroor अब शादियों और सामाजिक समारोहों से निकलकर सांस्कृतिक उत्सवों और कार्यक्रमों के मंच तक पहुँच गई है।
जैसा कि सऊदी समाचार एजेंसी एसपीए ने 11 अगस्त 2026 को बताया, इस प्रदर्शन में प्रतिभागी आमने-सामने दो पंक्तियों में खड़े होते हैं, जहाँ आवाज़ें एक-दूसरे के बाद गूँजती हैं और संगीत की धुन पर कदमताल होती है।
Al-Majroor की विशेषता कविता, लय और आंदोलनों के मेल से है। प्रदर्शन के केंद्र में ढोल बजाने वाले होते हैं, और कविता के छंदों तथा ढोल की गति के अनुसार कलाकार एक जीवंत लोक चित्र प्रस्तुत करते हैं।
इस कला की पहचान को पूरा करने के लिए कलाकार पारंपरिक पोशाक पहनते हैं, जो इस प्रदर्शन की पहचान का अभिन्न अंग है। पहले यह कला सामुदायिक जीवन, शादियों और उत्सवों का हिस्सा थी, जिसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक अवलोकन और अभ्यास के माध्यम से पहुँचाया गया।
Al-Majroor प्रदर्शन कैसे किया जाता है? इसमें प्रतिभागी आमने-सामने दो समूहों में खड़े होते हैं और काव्य पाठ तथा धुनों का बारी-बारी से प्रदर्शन करते हैं। मंच के केंद्र में ढोल बजाने वाले होते हैं, और पूरी प्रस्तुति आवाज़ों, कदमों और लय के तालमेल से चलती है।
Al-Majroor की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं? इस कला में कविता, लय और शारीरिक गतिविधियों का संगम होता है। कलाकार पारंपरिक पोशाक पहनते हैं, जो इस लोक कला की पहचान का एक अनिवार्य हिस्सा है।
Al-Majroor का सामाजिक महत्व क्या रहा है? यह कला पुराने समय में सामुदायिक जीवन, शादियों और सामाजिक मिलन का हिस्सा थी। इसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक केवल अवलोकन और निरंतर अभ्यास के माध्यम से स्थानांतरित किया गया।