Thursday, October 29, 2026
सऊदी समाचार

ग्रैंड मस्जिद के ज़ायरीन को केयर सेंटर चौबीस घंटे सेवाएँ दे रहे हैं

ग्रैंड मस्जिद के ज़ायरीन को केयर सेंटर चौबीस घंटे सेवाएँ दे रहे हैं

मक्का में ग्रैंड मस्जिद के ज़ायरीन के लिए केयर सेंटर चौबीस घंटे सेवाएँ दे रहे हैं। जनरल अथॉरिटी फ़ॉर द केयर ऑफ़ द अफ़ेयर्स ऑफ़ द ग्रैंड मस्जिद एंड द प्रॉफ़ेट्स मस्जिद अपने गेस्ट केयर सेंटरों के ज़रिये मस्जिद परिसर में ही ये सेवाएँ मुहैया करा रही है, ताकि ज़ायरीन का तजुर्बा आसान और पुरसुकून रहे।

जैसा कि सऊदी समाचार एजेंसी एसपीए ने 5 अक्टूबर 2026 को बताया, इन सेंटरों में रहनुमाई, सामान रखने की सुविधा और खोई-पाई चीज़ों की मदद जैसी सेवाएँ शामिल हैं। साथ ही बुज़ुर्गों और दिव्यांगों के लिए विशेष सहायता दी जाती है, और बच्चों, ख़वातीन तथा खोए हुए लोगों की अलग देखभाल की जाती है।

सेंटर ज़ायरीन को क्यूआर कोड के ज़रिये इंटरैक्टिव मैप भी मुहैया कराते हैं, जिससे वे ग्रैंड मस्जिद के अंदर मुख़्तलिफ़ मक़ामात और सेवाओं को आसानी से ढूँढ सकते हैं। अथॉरिटी के मुताबिक़ ये सेवाएँ उसकी उन कोशिशों का हिस्सा हैं जिनका मक़सद दी जाने वाली सेवाओं का मियार बुलंद करना है, ताकि ज़ायरीन अपनी इबादत और मनासिक को आसानी और इत्मीनान के साथ अंजाम दे सकें।

सबसे पहले ग़ौर करने वाली बात यह है कि ये सेवाएँ मस्जिद के अंदर ही, मौक़े पर दी जाती हैं। ज़ायरीन को किसी दफ़्तर तक जाने या किसी दूसरी जगह भटकने की ज़रूरत नहीं पड़ती। केयर सेंटर उसी जगह मौजूद हैं जहाँ लोग तवाफ़, नमाज़ और ज़ियारत के लिए आते हैं। क्या यही वजह नहीं कि मौक़े पर मिलने वाली मदद किसी भी दूर की व्यवस्था से ज़्यादा काम आती है?

एसपीए की रिपोर्ट के मुताबिक़ सेंटरों की सेवाओं में रहनुमाई सबसे बुनियादी हिस्सा है। ज़ायरीन को रास्ते, मक़ामात और सेवाओं की जानकारी दी जाती है। इसके साथ सामान रखने की सुविधा भी है, जिससे ज़ायरीन अपना असबाब रखकर फ़ारिग़ होकर इबादत कर सकें। खोई-पाई चीज़ों के लिए अलग मदद दी जाती है, ताकि कोई चीज़ खो जाने पर ज़ायर को परेशानी न उठानी पड़े।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सेंटर बुज़ुर्गों और दिव्यांगों के लिए विशेष सहायता देते हैं। यह ऐसे लोगों के लिए अहम है जिन्हें चलने-फिरने या रास्ता समझने में दिक़्क़त होती है। इसके अलावा बच्चों, ख़वातीन और खोए हुए लोगों की अलग देखभाल का ज़िक्र है। क्या भीड़ में खोए किसी बच्चे या बुज़ुर्ग के लिए ऐसा सहारा सबसे ज़्यादा मायने नहीं रखता?

सेवाओं की एक और कड़ी क्यूआर कोड से मिलने वाला इंटरैक्टिव मैप है। ज़ायरीन कोड स्कैन करके ग्रैंड मस्जिद के अंदर मुख़्तलिफ़ मक़ामात और सेवाओं की जगह देख सकते हैं। यह ऐसे वक़्त में ख़ासा मुफ़ीद है जब इंसान पहली बार आया हो और उसे अंदरूनी रास्तों की जानकारी न हो। क्या एक स्कैन में पूरी जानकारी मिल जाना भीड़ के दबाव को कम नहीं करता?

अथॉरिटी ने इन सेवाओं को अपनी उन कोशिशों का हिस्सा बताया है जिनका मक़सद दी जाने वाली सेवाओं का मियार बुलंद करना है। रिपोर्ट के मुताबिक़ इसका मक़सद यह है कि ज़ायरीन अपनी इबादत और मनासिक को आसानी और इत्मीनान के साथ अंजाम दे सकें। यानी सेवाओं का पैमाना सिर्फ़ सुविधा नहीं, बल्कि इबादत के माहौल को पुरसुकून बनाना भी है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि रिपोर्ट में सेंटरों की तादाद, उनके ठिकानों, कर्मचारियों की संख्या या काम के घंटों की कोई तफ़सील नहीं दी गई है। सिर्फ़ यह कहा गया है कि सेवाएँ चौबीस घंटे दी जाती हैं और वे मस्जिद परिसर में मौजूद हैं। रिपोर्ट में किसी ख़ास तारीख़ का ज़िक्र भी नहीं है, सिवाय इसके कि यह 5 अक्टूबर 2026 को जारी हुई।

यह भी साफ़ नहीं किया गया कि सामान रखने की सुविधा कितने वक़्त के लिए है, या खोई-पाई चीज़ों की मदद किस तरह दर्ज की जाती है। इसी तरह इंटरैक्टिव मैप में कौन-कौन से मक़ामात और सेवाएँ शामिल हैं, इसकी सूची नहीं दी गई। रिपोर्ट में यह भी नहीं बताया गया कि बुज़ुर्गों और दिव्यांगों के लिए विशेष सहायता में क्या-क्या शामिल है।

इन सेवाओं का ज़िक्र ऐसे वक़्त में हुआ है जब ग्रैंड मस्जिद में दुनिया भर से ज़ायरीन आते हैं और हर ज़ायर की ज़रूरत अलग होती है। कोई रास्ता पूछना चाहता है, कोई अपना सामान रखना चाहता है, तो कोई अपने बच्चे या बुज़ुर्ग को खो देने की हालत से बचना चाहता है। क्या ऐसी मिली-जुली ज़रूरतों के लिए एक ही जगह पर मिलने वाली मदद सबसे कारगर तरीक़ा नहीं?

रिपोर्ट के मुताबिक़ सेंटरों की सेवाओं में रहनुमाई, सामान रखने की सुविधा, खोई-पाई चीज़ों की मदद, बुज़ुर्गों और दिव्यांगों के लिए विशेष सहायता, बच्चों, ख़वातीन और खोए हुए लोगों की देखभाल, और क्यूआर कोड से इंटरैक्टिव मैप शामिल हैं। यही छह बुनियादी चीज़ें रिपोर्ट में गिनाई गई हैं। इनके अलावा कोई सेवा रिपोर्ट में नहीं बताई गई।

अथॉरिटी का नाम ही बताता है कि उसका काम ग्रैंड मस्जिद और प्रॉफ़ेट्स मस्जिद के मामलों की देखभाल है। रिपोर्ट में सिर्फ़ ग्रैंड मस्जिद का ज़िक्र है, प्रॉफ़ेट्स मस्जिद के सेंटरों का ज़िक्र नहीं है। यानी यह रिपोर्ट ख़ास तौर पर मक्का की ग्रैंड मस्जिद में दी जा रही सेवाओं के बारे में है।

सेवाओं का मक़सद सिर्फ़ मदद करना नहीं, बल्कि ज़ायरीन के तजुर्बे को आसान और पुरसुकून बनाना बताया गया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इन सेवाओं से ज़ायरीन अपनी इबादत और मनासिक आसानी और इत्मीनान के साथ अंजाम दे सकें। क्या सुविधा और इबादत का यह रिश्ता ही ऐसी सेवाओं की असली कसौटी नहीं?

रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया कि सेंटर कब शुरू हुए, कितने ज़ायरीन ने इनका फ़ायदा उठाया, या आगे इन्हें कहाँ तक बढ़ाया जाएगा। इन सेवाओं के नतीजों या किसी आँकड़े का भी ज़िक्र नहीं है। रिपोर्ट सिर्फ़ यह बताती है कि सेवाएँ जारी हैं और उनका दायरा क्या है।

जो बात रिपोर्ट में साफ़ है, वह यह है कि मदद मस्जिद के अंदर ही मिलती है और उसमें रहनुमाई से लेकर देखभाल तक कई चीज़ें शामिल हैं। क्यूआर कोड वाला इंटरैक्टिव मैप भी इसी कोशिश का हिस्सा है, जिससे ज़ायरीन ख़ुद ही जगहें और सेवाएँ ढूँढ सकें। क्या ख़ुद ढूँढ पाने की सुविधा किसी से पूछने के इंतज़ार से बेहतर नहीं?

एसपीए की रिपोर्ट में यह भी नहीं बताया गया कि इन सेंटरों तक ज़ायरीन कैसे पहुँचते हैं, या उनकी जगह कैसे पहचानी जा सकती है। इंटरैक्टिव मैप के ज़रिये मक़ामात ढूँढने की बात कही गई है, लेकिन सेंटर ख़ुद कहाँ हैं, इसका ज़िक्र नहीं है। यह जानकारी रिपोर्ट में मौजूद नहीं है।

रिपोर्ट में बच्चों, ख़वातीन और खोए हुए लोगों की अलग देखभाल का ज़िक्र है। यह बताता है कि सेंटर सिर्फ़ आम रहनुमाई तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ख़ास हालात के लिए भी तैयार हैं। भीड़ में कोई खो जाए तो उसकी मदद के लिए अलग इंतज़ाम होना कितना ज़रूरी है, यह इसी से समझा जा सकता है।

अथॉरिटी के मुताबिक़ ये सेवाएँ सेवाओं का मियार बुलंद करने की कोशिशों का हिस्सा हैं। रिपोर्ट में इस कोशिश का नतीजा या कोई पैमाना नहीं दिया गया। सिर्फ़ यह बताया गया है कि सेवाएँ जारी हैं और उनका मक़सद ज़ायरीन की इबादत को आसान बनाना है।

इस पूरी रिपोर्ट में जो सबसे काम की जानकारी है, वह यह है कि ग्रैंड मस्जिद के ज़ायरीन को मौक़े पर रहनुमाई, सामान रखने की जगह, खोई-पाई चीज़ों की मदद, बुज़ुर्गों और दिव्यांगों के लिए सहायता, बच्चों, ख़वातीन और खोए लोगों की देखभाल, और क्यूआर कोड से इंटरैक्टिव मैप मिलता है। यह सब चौबीस घंटे उपलब्ध बताया गया है।

रिपोर्ट में इन सेवाओं की लागत, कर्मचारियों की तादाद, सेंटरों की संख्या, उनके ठिकाने, शुरुआत की तारीख़, ज़ायरीन की संख्या या किसी नतीजे का ज़िक्र नहीं है। इंटरैक्टिव मैप में शामिल मक़ामात की सूची भी नहीं दी गई है। यही बातें रिपोर्ट में छूटी हुई हैं।

ग्रैंड मस्जिद के केयर सेंटर कौन-कौन सी सेवाएँ देते हैं? एसपीए के मुताबिक़ सेंटर रहनुमाई, सामान रखने की सुविधा और खोई-पाई चीज़ों की मदद देते हैं। इनके अलावा बुज़ुर्गों और दिव्यांगों के लिए विशेष सहायता, और बच्चों, ख़वातीन तथा खोए हुए लोगों की अलग देखभाल की जाती है। ज़ायरीन को क्यूआर कोड के ज़रिये इंटरैक्टिव मैप भी मिलता है, जिससे वे मस्जिद के अंदर मक़ामात और सेवाएँ ढूँढ सकते हैं।

ये सेवाएँ कहाँ और कब उपलब्ध हैं? रिपोर्ट के मुताबिक़ सेवाएँ ग्रैंड मस्जिद में मौक़े पर, यानी मस्जिद परिसर में ही दी जाती हैं। ये चौबीस घंटे उपलब्ध बताई गई हैं। जनरल अथॉरिटी फ़ॉर द केयर ऑफ़ द अफ़ेयर्स ऑफ़ द ग्रैंड मस्जिद एंड द प्रॉफ़ेट्स मस्जिद इन्हें अपने गेस्ट केयर सेंटरों के ज़रिये मुहैया करा रही है। रिपोर्ट में सेंटरों की तादाद या ठिकानों की तफ़सील नहीं दी गई।

क्यूआर कोड वाला इंटरैक्टिव मैप क्या काम करता है? एसपीए के मुताबिक़ सेंटर ज़ायरीन को क्यूआर कोड के ज़रिये इंटरैक्टिव मैप मुहैया कराते हैं। इससे ज़ायरीन ग्रैंड मस्जिद के अंदर मुख़्तलिफ़ मक़ामात और सेवाओं को आसानी से ढूँढ सकते हैं। रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया कि मैप में कौन-कौन से मक़ामात या सेवाएँ शामिल हैं, और न ही यह कि कोड कहाँ से मिलता है।

इन सेवाओं का मक़सद क्या बताया गया है? रिपोर्ट के मुताबिक़ ये सेवाएँ अथॉरिटी की उन कोशिशों का हिस्सा हैं जिनका मक़सद दी जाने वाली सेवाओं का मियार बुलंद करना है। इसका मक़सद यह भी बताया गया है कि ज़ायरीन अपनी इबादत और मनासिक आसानी और इत्मीनान के साथ अंजाम दे सकें। रिपोर्ट में इस मक़सद को हासिल करने का कोई पैमाना या नतीजा नहीं दिया गया।

बुज़ुर्गों, दिव्यांगों और खोए लोगों के लिए क्या इंतज़ाम हैं? एसपीए के मुताबिक़ सेंटर बुज़ुर्गों और दिव्यांगों के लिए विशेष सहायता देते हैं। साथ ही बच्चों, ख़वातीन और खोए हुए लोगों की अलग देखभाल की जाती है। रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया कि विशेष सहायता में क्या-क्या शामिल है, या खोए हुए लोगों को ढूँढने की प्रक्रिया क्या है। इन सेवाओं के लिए कर्मचारियों की तादाद भी नहीं बताई गई।

रिपोर्ट में कौन सी जानकारी नहीं दी गई? रिपोर्ट में सेंटरों की संख्या, उनके ठिकाने, कर्मचारियों की तादाद, सेवाओं की लागत, शुरुआत की तारीख़ और ज़ायरीन की संख्या का ज़िक्र नहीं है। इंटरैक्टिव मैप में शामिल मक़ामात की सूची भी नहीं दी गई। रिपोर्ट में सिर्फ़ ग्रैंड मस्जिद का ज़िक्र है, प्रॉफ़ेट्स मस्जिद के सेंटरों का नहीं। यह रिपोर्ट 5 अक्टूबर 2026 को एसपीए ने जारी की।