ताइफ शहर की सबसे पुरानी लोक कलाओं में से एक ‘अल-मजरूर’ ने अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखी है और अब यह शादियों और सामाजिक अवसरों के साथ-साथ त्योहारों और पर्यटन कार्यक्रमों का हिस्सा बन गई है।
जैसा कि सऊदी समाचार एजेंसी एसपीए ने 10 अगस्त 2026 को बताया, यह कला कविता, गायन, लय, सामूहिक गतिविधियों और पारंपरिक पहनावे, विशेष रूप से ‘अल-हुवैसी’ पोशाक के समन्वय पर आधारित है। इसमें प्रतिभागी दो आमने-सामने की पंक्तियों में खड़े होकर দফ और ढोल की संगत के साथ सामूहिक रूप से कविताओं और धुनों का प्रदर्शन करते हैं।
अल-मजरूर में ‘अल-शबशरा’, ‘अल-मुकाटाआ’, ‘अल-दमदमा’, ‘अल-कसरा’, ‘अल-मरुब’ और ‘अल-मखौमस’ जैसी विशिष्ट प्रदर्शन शैलियाँ और शब्दावलियाँ शामिल हैं।
शोधकर्ता सअद अल-सुफयानी ने बताया कि यह कला पीढ़ियों से ताइफ के लोगों के उत्सवों से जुड़ी रही है। युवाओं की भागीदारी और राष्ट्रीय कार्यक्रमों में इसकी उपस्थिति इस विरासत को भविष्य की पीढ़ियों तक पहुँचाने में मदद कर रही है।
अल-मजरूर कला का प्रदर्शन कैसे किया जाता है? इस कला में प्रतिभागी दो आमने-सामने की पंक्तियों में खड़े होते हैं। वे দফ और ढोल की संगत के साथ सामूहिक रूप से कविताओं और धुनों का गायन करते हैं, जिसमें ‘अल-हुवैसी’ नामक पारंपरिक पोशाक पहनी जाती है।
अल-मजरूर की विशिष्ट शैलियाँ कौन-सी हैं? इस कला की संरचना में ‘अल-शबशरा’, ‘अल-मुकाटाआ’, ‘अल-दमदमा’, ‘अल-कसरा’, ‘अल-मरुब’ और ‘अल-मखौमस’ जैसी विशिष्ट प्रदर्शन शैलियाँ और शब्दावलियाँ शामिल हैं, जो इसकी मौलिकता को दर्शाती हैं।
इस कला को संरक्षित करने में क्या मदद मिल रही है? त्योहारों, राष्ट्रीय अवसरों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में इसकी बढ़ती उपस्थिति से यह कला पर्यटकों के बीच लोकप्रिय हो रही है। साथ ही, लोक समूहों में युवाओं की भागीदारी इसे अगली पीढ़ियों तक पहुँचाने में सहायक है।