रियाद में सोमवार को सऊदी अरब ने अल-अक्सा मस्जिद में इजरायली कब्ज़ा अधिकारियों और चरमपंथी बस्तीवासियों के एक समूह की लगातार उकसाने वाली कार्रवाइयों की कड़े शब्दों में निंदा की, जिनमें कब्ज़ा बलों की सुरक्षा में मस्जिद की पवित्रता तथा उसकी धार्मिक और ऐतिहासिक स्थिति का उल्लंघन शामिल है।
जैसा कि सऊदी समाचार एजेंसी एसपीए ने बताया, विदेश मंत्रालय ने एक बयान में अंतरराष्ट्रीय कानून के इन उल्लंघनों को खारिज करने की सऊदी अरब की स्थिति दोहराई, जिसके बारे में मंत्रालय ने कहा कि ये दुनिया भर के मुसलमानों की भावनाओं को भड़काते हैं।
अल-अक्सा मस्जिद मुसलमानों के लिए पहले किबला और तीसरे पवित्र स्थल के रूप में जानी जाती है, और उसकी धार्मिक तथा ऐतिहासिक स्थिति पर सवाल उठाने वाली किसी भी कार्रवाई को मंत्रालय ने अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया। क्या पवित्र स्थलों की पवित्रता का सम्मान अंतरराष्ट्रीय शांति और सह-अस्तित्व की सबसे बुनियादी शर्त नहीं होनी चाहिए?
बयान में कहा गया कि कब्ज़ा बलों की सुरक्षा में की गई ये कार्रवाइयाँ मस्जिद की पवित्रता और उसके धार्मिक तथा ऐतिहासिक दर्जे का उल्लंघन हैं। मंत्रालय ने इन्हें सिर्फ निंदनीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अस्वीकार्य बताया। जब पवित्र स्थलों की सुरक्षा पर सवाल उठते हैं, तो क्या क्षेत्रीय शांति की कोई भी पहल टिकाऊ रह सकती है?
विदेश मंत्रालय ने इजरायली विलय संबंधी बयानों का जिक्र करते हुए कहा, “सऊदी अरब दक्षिणी लेबनान के क्षेत्रों और गाजा पट्टी में ‘येलो लाइन’ तक फैले क्षेत्रों के विलय से जुड़े इजरायली बयानों की निंदा करता है। यह किसी भी इजरायली विस्तारवादी प्रयास को खारिज करता है और भाईचारे वाले फलस्तीनी लोगों के 1967 की सीमाओं पर पूर्वी येरुशलम को राजधानी बनाकर स्वतंत्र राज्य स्थापित करने के अधिकार पर जोर देता है।”
यह बयान ऐसे समय आया है जब क्षेत्र में तनाव के कई मोर्चे खुले हैं। दक्षिणी लेबनान के क्षेत्रों और गाजा पट्टी में ‘येलो लाइन’ तक फैले इलाकों के विलय की इजरायली बातों को सऊदी अरब ने विस्तारवादी प्रयास करार दिया। क्या सीमाओं को बलपूर्वक बदलने की कोशिशें कभी स्थायी शांति की नींव बन सकती हैं?
मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि सऊदी अरब किसी भी इजरायली विस्तारवादी प्रयास को अस्वीकार करता है। यह रुख अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र के सिद्धांतों के अनुरूप है, जो बल के जरिए भूमि हासिल करने की मान्यता को खारिज करते हैं। क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय उन नियमों को लागू करने में सक्षम है जिन पर उसने खुद हस्ताक्षर किए हैं?
बयान में फलस्तीनी लोगों के अधिकार को दोहराया गया। मंत्रालय के अनुसार, भाईचारे वाले फलस्तीनी लोगों को 1967 की सीमाओं पर पूर्वी येरुशलम को राजधानी बनाकर अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित करने का अधिकार है। यह स्थिति सऊदी अरब ने सोमवार को जारी अपने बयान में फिर से रखी। क्या एक स्वतंत्र फलस्तीनी राज्य की स्थापना के बिना क्षेत्र में कोई स्थायी समाधान संभव है?
अल-अक्सा मस्जिद से जुड़े उल्लंघनों पर मंत्रालय ने कहा कि ये दुनिया भर के मुसलमानों की भावनाओं को भड़काते हैं। सऊदी अरब ने इन्हें अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया और अपनी अस्वीकृति दोहराई। मस्जिद की धार्मिक और ऐतिहासिक स्थिति का मुद्दा दुनिया भर के मुसलमानों के लिए भावनात्मक और आस्था से जुड़ा हुआ है। क्या पवित्र स्थलों को राजनीतिक बहस का मैदान बनाना किसी भी पक्ष के हित में है?
सऊदी अरब का यह बयान ऐसे समय में आया है जब कब्ज़ा अधिकारियों और चरमपंथी बस्तीवासियों के एक समूह की कार्रवाइयों की लगातार रिपोर्टें सामने आ रही हैं। मंत्रालय ने इन कार्रवाइयों को कब्ज़ा बलों की सुरक्षा में अंजाम दिया जाना बताया। क्या संरक्षण देने वालों की जवाबदेही के बिना ऐसी घटनाएँ रुक सकती हैं?
विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में अंतरराष्ट्रीय कानून का हवाला दिया और कहा कि ये उल्लंघन दुनिया भर के मुसलमानों की भावनाओं को भड़काते हैं। सऊदी अरब ने इस मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट रखी है और किसी भी ऐसी कार्रवाई को खारिज किया है जो मस्जिद की पवित्रता या उसके धार्मिक तथा ऐतिहासिक दर्जे को चोट पहुँचाए। क्या धार्मिक स्थलों की गरिमा की रक्षा सभी पक्षों की साझा जिम्मेदारी नहीं है?
विलय संबंधी बयानों पर मंत्रालय ने दो स्थानों का जिक्र किया — दक्षिणी लेबनान के क्षेत्र और गाजा पट्टी में ‘येलो लाइन’ तक फैले क्षेत्र। सऊदी अरब ने इन दोनों को लेकर इजरायली बयानों की निंदा की और किसी भी विस्तारवादी प्रयास को खारिज किया। क्या सीमाओं के एकतरफा बदलाव की घोषणाएँ कभी अंतरराष्ट्रीय मान्यता पा सकती हैं?
बयान में फलस्तीनी राज्य की स्थापना के लिए 1967 की सीमाओं और पूर्वी येरुशलम को राजधानी बनाने का स्पष्ट उल्लेख है। यह सऊदी अरब की ओर से दोहराई गई स्थिति है, जिसे मंत्रालय ने सोमवार के बयान में रखा। क्या यह स्थिति क्षेत्र में व्यापक समाधान की दिशा में एक व्यावहारिक आधार बन सकती है?
सऊदी अरब ने अल-अक्सा मस्जिद से जुड़े उल्लंघनों और विलय संबंधी बयानों, दोनों मुद्दों को एक ही बयान में उठाया। मंत्रालय ने पहले हिस्से में मस्जिद की पवित्रता और उसके धार्मिक तथा ऐतिहासिक दर्जे के उल्लंघन की निंदा की, और दूसरे हिस्से में विलय संबंधी इजरायली बयानों को खारिज किया। क्या दोनों मुद्दों को अलग-अलग देखना वास्तविकता को समझने में मदद करता है?
मंत्रालय ने कहा कि सऊदी अरब अंतरराष्ट्रीय कानून के इन उल्लंघनों को खारिज करता है। बयान में यह भी कहा गया कि ये उल्लंघन दुनिया भर के मुसलमानों की भावनाओं को भड़काते हैं। यह रुख सऊदी अरब की ओर से लगातार दोहराया जाता रहा है। क्या वैश्विक स्तर पर मुस्लिम समुदायों की भावनाओं का सम्मान कूटनीति का हिस्सा बनना चाहिए?
बयान में इजरायली बयानों का हवाला देते हुए कहा गया कि सऊदी अरब दक्षिणी लेबनान के क्षेत्रों और गाजा पट्टी में ‘येलो लाइन’ तक फैले क्षेत्रों के विलय की निंदा करता है। मंत्रालय ने इसे इजरायली विस्तारवादी प्रयास बताया और फलस्तीनी लोगों के अधिकार पर जोर दिया। क्या विस्तारवाद की नीति कभी स्थायी सुरक्षा दे सकती है?
सऊदी अरब ने फलस्तीनी लोगों को ‘भाईचारे वाले’ बताया और उनके स्वतंत्र राज्य के अधिकार को दोहराया। मंत्रालय के अनुसार यह राज्य 1967 की सीमाओं पर होना चाहिए और उसकी राजधानी पूर्वी येरुशलम होनी चाहिए। यह स्थिति सऊदी अरब के बयान का केंद्रीय हिस्सा है। क्या इस स्थिति के बिना क्षेत्र में स्थायी शांति की कल्पना की जा सकती है?
बयान में यह भी कहा गया कि सऊदी अरब किसी भी इजरायली विस्तारवादी प्रयास को खारिज करता है। यह खारिज अंतरराष्ट्रीय कानून के उन सिद्धांतों पर आधारित है जो बल के जरिए भूमि पर कब्ज़े को अस्वीकार करते हैं। मंत्रालय ने इसे स्पष्ट शब्दों में रखा। क्या अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन सभी के लिए समान रूप से लागू होना चाहिए?
अल-अक्सा मस्जिद के मामले में मंत्रालय ने कब्ज़ा अधिकारियों और चरमपंथी बस्तीवासियों के एक समूह की कार्रवाइयों का जिक्र किया, जो कब्ज़ा बलों की सुरक्षा में हुईं। इनमें मस्जिद की पवित्रता तथा उसकी धार्मिक और ऐतिहासिक स्थिति का उल्लंघन शामिल बताया गया। क्या पवित्र स्थलों पर इस तरह की कार्रवाइयों का कोई औचित्य हो सकता है?
सऊदी अरब ने अपने बयान में अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लेख करते हुए कहा कि ये उल्लंघन दुनिया भर के मुसलमानों की भावनाओं को भड़काते हैं। मंत्रालय ने इस आधार पर इन कार्रवाइयों को खारिज किया। यह बयान सोमवार को जारी हुआ और एसपीए ने इसे प्रकाशित किया। क्या धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाली कार्रवाइयों पर रोक लगाना अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्राथमिकता होनी चाहिए?
विलय संबंधी बयानों के संदर्भ में मंत्रालय ने दक्षिणी लेबनान और गाजा पट्टी में ‘येलो लाइन’ तक फैले क्षेत्रों का जिक्र किया। सऊदी अरब ने इन इजरायली बयानों की निंदा की और किसी भी विस्तारवादी प्रयास को खारिज किया। यह रुख क्षेत्रीय स्थिरता के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। क्या एकतरफा विलय की घोषणाएँ क्षेत्रीय स्थिरता को कमजोर नहीं करतीं?
बयान में फलस्तीनी लोगों के स्वतंत्र राज्य के अधिकार को स्पष्ट रूप से दोहराया गया। मंत्रालय के अनुसार यह राज्य 1967 की सीमाओं पर स्थापित होना चाहिए और पूर्वी येरुशलम उसकी राजधानी होनी चाहिए। सऊदी अरब ने इसे भाईचारे वाले फलस्तीनी लोगों का अधिकार बताया। क्या यह अधिकार अंतरराष्ट्रीय संकल्पों का हिस्सा नहीं है?
सऊदी अरब ने सोमवार को जारी अपने बयान में इजरायली उकसावों और विलय संबंधी घोषणाओं, दोनों पर अपनी स्थिति स्पष्ट की। मंत्रालय ने अल-अक्सा मस्जिद से जुड़े उल्लंघनों की कड़े शब्दों में निंदा की और विलय संबंधी बयानों को भी खारिज किया। यह बयान रियाद से जारी हुआ। क्या इस तरह के स्पष्ट रुख से क्षेत्रीय तनाव कम करने में मदद मिल सकती है?
एसपीए के अनुसार बयान में यह भी कहा गया कि सऊदी अरब अंतरराष्ट्रीय कानून के इन उल्लंघनों को खारिज करता है। मंत्रालय ने कहा कि ये उल्लंघन दुनिया भर के मुसलमानों की भावनाओं को भड़काते हैं। यह स्थिति सऊदी अरब ने पहले भी दोहराई है और सोमवार के बयान में इसे फिर रखा गया। क्या ऐसे मुद्दों पर लगातार स्थिति स्पष्ट करना कूटनीतिक दबाव बनाने में सहायक होता है?
बयान में विलय के संदर्भ में इजरायली बयानों का जिक्र करते हुए मंत्रालय ने कहा कि सऊदी अरब किसी भी इजरायली विस्तारवादी प्रयास को खारिज करता है। साथ ही फलस्तीनी लोगों के 1967 की सीमाओं पर पूर्वी येरुशलम को राजधानी बनाकर स्वतंत्र राज्य स्थापित करने के अधिकार पर जोर दिया गया। यह बयान का सबसे स्पष्ट राजनीतिक हिस्सा है। क्या इस स्थिति के बिना कोई भी शांति योजना सफल हो सकती है?
अल-अक्सा मस्जिद की धार्मिक और ऐतिहासिक स्थिति का उल्लंघन बयान का पहला हिस्सा है, जबकि विलय संबंधी बयान दूसरा हिस्सा। मंत्रालय ने दोनों को अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में रखा और सऊदी अरब की अस्वीकृति दोहराई। यह बयान सोमवार को सामने आया। क्या दोनों मुद्दों पर एक साथ स्थिति स्पष्ट करना क्षेत्रीय संदेश को मजबूत बनाता है?
एसपीए ने बताया कि यह बयान रियाद से सोमवार को जारी हुआ। इसमें विदेश मंत्रालय ने अल-अक्सा मस्जिद में कब्ज़ा अधिकारियों और चरमपंथी बस्तीवासियों के एक समूह की कार्रवाइयों की निंदा की, जो कब्ज़ा बलों की सुरक्षा में हुईं। साथ ही दक्षिणी लेबनान और गाजा पट्टी में ‘येलो लाइन’ तक फैले क्षेत्रों के विलय संबंधी इजरायली बयानों को खारिज किया। क्या इस बयान के बाद क्षेत्र में कोई ठोस कदम उठाया जाएगा?
बयान में फलस्तीनी लोगों के अधिकार को केंद्रीय स्थान दिया गया। मंत्रालय ने कहा कि भाईचारे वाले फलस्तीनी लोगों को 1967 की सीमाओं पर पूर्वी येरुशलम को राजधानी बनाकर स्वतंत्र राज्य स्थापित करने का अधिकार है। सऊदी अरब ने किसी भी इजरायली विस्तारवादी प्रयास को खारिज किया। क्या यह स्थिति आने वाले समय में कूटनीतिक पहल का आधार बनेगी?
एसपीए की ओर से जारी इस बयान में यह नहीं बताया गया कि सऊदी अरब इस मुद्दे पर कोई विशेष कूटनीतिक कदम उठाएगा या नहीं, न ही किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर किसी विशेष पहल का उल्लेख है। बयान में यह भी नहीं बताया गया कि इन घटनाओं पर किसी अन्य देश या संस्था से समन्वय हुआ है या नहीं। यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि बयान के बाद कोई बैठक या परामर्श प्रस्तावित है या नहीं।
सऊदी अरब ने अल-अक्सा मस्जिद के मामले में क्या कहा? विदेश मंत्रालय ने कब्ज़ा अधिकारियों और चरमपंथी बस्तीवासियों के एक समूह की लगातार उकसाने वाली कार्रवाइयों की कड़े शब्दों में निंदा की। बयान के अनुसार इनमें अल-अक्सा मस्जिद की पवित्रता तथा उसकी धार्मिक और ऐतिहासिक स्थिति का उल्लंघन शामिल है, जो कब्ज़ा बलों की सुरक्षा में किया गया। मंत्रालय ने इन्हें अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया और कहा कि ये दुनिया भर के मुसलमानों की भावनाओं को भड़काते हैं।
विलय संबंधी इजरायली बयानों पर सऊदी अरब की स्थिति क्या है? मंत्रालय ने कहा कि सऊदी अरब दक्षिणी लेबनान के क्षेत्रों और गाजा पट्टी में ‘येलो लाइन’ तक फैले क्षेत्रों के विलय से जुड़े इजरायली बयानों की निंदा करता है। बयान में कहा गया कि सऊदी अरब किसी भी इजरायली विस्तारवादी प्रयास को खारिज करता है। यह स्थिति अंतरराष्ट्रीय कानून के उन सिद्धांतों पर आधारित है जो बल के जरिए भूमि हासिल करने को अस्वीकार करते हैं।
फलस्तीनी राज्य के बारे में बयान में क्या कहा गया? मंत्रालय ने कहा कि सऊदी अरब भाईचारे वाले फलस्तीनी लोगों के 1967 की सीमाओं पर पूर्वी येरुशलम को राजधानी बनाकर स्वतंत्र राज्य स्थापित करने के अधिकार पर जोर देता है। यह स्थिति बयान का केंद्रीय हिस्सा है और इसे सोमवार को जारी बयान में दोहराया गया। बयान में किसी भी इजरायली विस्तारवादी प्रयास को खारिज करने की बात भी कही गई।
यह बयान कब और कहाँ से जारी हुआ? एसपीए के अनुसार यह बयान रियाद से सोमवार को जारी हुआ। बयान विदेश मंत्रालय की ओर से आया, जिसमें अल-अक्सा मस्जिद से जुड़े उल्लंघनों और विलय संबंधी इजरायली बयानों, दोनों पर सऊदी अरब की स्थिति रखी गई। एसपीए ने इसे 28 सितंबर 2026 को प्रकाशित किया। बयान में अंतरराष्ट्रीय कानून का हवाला देते हुए इन कार्रवाइयों को खारिज किया गया।
बयान में किन क्षेत्रों का नाम लिया गया? बयान में दक्षिणी लेबनान के क्षेत्रों और गाजा पट्टी में ‘येलो लाइन’ तक फैले क्षेत्रों का जिक्र किया गया। मंत्रालय ने इन क्षेत्रों के विलय से जुड़े इजरायली बयानों की निंदा की। साथ ही 1967 की सीमाओं और पूर्वी येरुशलम को राजधानी बनाने का उल्लेख किया गया। बयान में अल-अक्सा मस्जिद का भी जिक्र है, जहाँ के उल्लंघनों की निंदा की गई।
एसपीए की रिपोर्ट में क्या नहीं बताया गया? रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया कि सऊदी अरब इस मुद्दे पर कोई विशेष कूटनीतिक कदम उठाएगा या नहीं। किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर किसी विशेष पहल का भी उल्लेख नहीं है। यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि इन घटनाओं पर किसी अन्य देश या संस्था से समन्वय हुआ है या नहीं, और न ही बयान के बाद किसी बैठक या परामर्श का जिक्र है।





