Monday, September 14, 2026
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باحे में ‘अर्दा जुनुबी’ लोक कला सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है

باحे में ‘अर्दा जुनुबी’ लोक कला सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है

باحे क्षेत्र की ‘अर्दा जुनुबी’ एक प्रमुख प्रदर्शन कला है, जो कविता, लय, समन्वित गतिविधियों और पारंपरिक पोशाक के माध्यम से स्थानीय पहचान और सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित करती है।

जैसा कि सऊदी समाचार एजेंसी एसपीए ने 11 अगस्त 2026 को बताया, बाहे संस्कृति और कला सोसायटी के शाखा प्रबंधक अली अल-बयदानी ने इसे सदियों पुरानी विरासत बताया जो पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है। इस क्षेत्र में 350 से अधिक सदस्यों वाले 12 लोक समूह सक्रिय हैं।

‘अर्दा जुनुबी’ का प्रदर्शन कवियों और ‘अल-ज़िर’ (एक बेलनाकार ढोल) जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों और कभी-कभी ‘अल-बरज़ान’ के साथ किया जाता है। प्रतिभागी समन्वित पंक्तियों और गोलाकार लयबद्ध गतिविधियों में भाग लेते हैं, और कुछ प्रदर्शनों में तलवार, बंदूक या खंजर का उपयोग किया जाता है।

باحे क्षेत्र ‘अल-लइब’, ‘अल-मुसहाबनी’, ‘अल-लबिनी’, ‘अल-मजालिसी’ और ‘तुरुक अल-जबल’ जैसी विविध लोक कलाओं का भी केंद्र है। सोसायटी ‘अल-हरमोज’, ‘अल-महशूश’, ‘अल-सामर’ सहित अन्य पुरानी कलाओं के दस्तावेजीकरण और पुनरुद्धार के लिए काम कर रही है। विज्ञप्ति में इन समूहों के वित्तपोषण या विशिष्ट आयोजन तिथियों का उल्लेख नहीं है।

‘अर्दा जुनुबी’ प्रदर्शन की क्या विशेषताएं हैं? यह कला कविता, लय और पारंपरिक पोशाक का मिश्रण है। इसमें प्रतिभागी समन्वित पंक्तियों और गोलाकार गतिविधियों में प्रदर्शन करते हैं, जिसमें तलवार, बंदूक या खंजर का उपयोग किया जाता है और ‘अल-ज़िर’ जैसे ढोल बजाए जाते हैं।

باحे क्षेत्र में लोक कला का स्तर क्या है? यहाँ 350 से अधिक सदस्यों वाले 12 लोक समूह सक्रिय हैं। अली अल-बयदानी के अनुसार, यह सदियों पुरानी विरासत है जो पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित हुई है।

सोसायटी किन अन्य कलाओं के पुनरुद्धार पर काम कर रही है? संस्कृति और कला सोसायटी ‘अल-हरमोज’, ‘अल-महशूश’, ‘अल-सामर’, ‘अल-लइब’, ‘अल-मुसहाबनी’, ‘तुरुक अल-जबल’ और ‘अल-मजालिसी’ जैसी पुरानी कलाओं के दस्तावेजीकरण और पुनरुद्धार के प्रयास कर रही है।