रियाद में किंग फैसल सेंटर फॉर रिसर्च एंड इस्लामिक स्टडीज (KFCRIS) के यूनेस्को चेयर इन ट्रांसलेटिंग कल्चर्स ने ‘ट्रांसलेटिंग कल्चर्स इन द अरब वर्ल्ड: न्यू हिस्ट्रीज एंड जियोग्राफीज’ के लॉन्च कार्यक्रमों के तहत दूसरा संगोष्ठी आयोजित किया। इस आयोजन को लिटरेचर, पब्लिशिंग एंड ट्रांसलेशन कमीशन का समर्थन प्राप्त है और यह Routledge द्वारा हाल ही में प्रकाशित पुस्तक पर आधारित है।
जैसा कि सऊदी समाचार एजेंसी एसपीए ने 7 अक्टूबर 2026 को बताया, यह संगोष्ठी 21 सितंबर को आयोजित पहले संगोष्ठी के दौरान शुरू हुए संवाद को आगे बढ़ाती है। पहले कार्यक्रम में फिलोलॉजी, अनुवाद की असंभवता, भाषाई विविधता और अनुवाद संस्कृतियों के विकास के संदर्भ में भाषा न्याय के प्रश्नों पर चर्चा की गई थी। क्या अनुवाद केवल शब्दों का परिवर्तन है या यह पूरी संस्कृतियों को जोड़ने का एक माध्यम है?
दूसरे संगोष्ठी ने इन वैचारिक प्रश्नों से आगे बढ़कर अरब और भूमध्यसागरीय दुनिया में अनुवाद के सांस्कृतिक प्रक्षेपवक्रों का पता लगाया। इसमें उन ऐतिहासिक क्षणों की खोज की गई जिनमें अनुवाद ने ज्ञान के प्रसार और बौद्धिक एवं सांस्कृतिक आदान-प्रदान में योगदान दिया। क्या इतिहास के वे क्षण आज के वैश्विक संवाद को समझने में मदद कर सकते हैं? इस प्रक्रिया में, अरब दुनिया को ज्ञान और सांस्कृतिक विनिमय के एक उत्पादक स्थल के रूप में देखते हुए अनुवाद के इतिहास और सिद्धांतों पर पुनर्विचार करने के लिए स्थान बनाया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत यूनेस्को चेयर इन ट्रांसलेटिंग कल्चर्स के रिसर्च असिस्टेंट उमेर अल-दुलामी की टिप्पणियों से हुई। संगोष्ठी का संचालन यूनिवर्सिटी ऑफ ग्लासगो में फ्रेंच और तुलनात्मक साहित्य के मार्शल प्रोफेसर माइकल सिरोटिंस्की ने किया। क्या विभिन्न देशों के विद्वानों का एक साथ आना अनुवाद की वैश्विक प्रकृति को नहीं दर्शाता?
इस चर्चा में कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ शामिल हुए, जिनमें मोहम्मद V यूनिवर्सिटी के फैकल्टी ऑफ लेटर्स एंड ह्यूमन साइंसेज के मोरक्कन विचारक प्रोफेसर अब्देलसलाम बेनाबदेलाली शामिल थे। इसके अलावा, मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) में राइटिंग, रेटोरिक और प्रोफेशनल कम्युनिकेशन के निदेशक डॉ. एंड्रियास करातसोलिस, यूनिवर्सिटी ऑफ सालामांका में ट्रांसलेशन एंड इंटरप्रेटिंग स्टडीज के प्रोफेसर ओविडी कार्बोनल कॉर्टेस और ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी में राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लेक्चरर तथा KFCRIS के रिसर्च फेलो डॉ. मोहम्मद अलसुदाइरी ने भी भाग लिया। क्या यह विविधता अनुवाद के क्षेत्र में नए दृष्टिकोण प्रदान करती है?
प्रस्तुतियों के दौरान ‘फिलॉसफी एंड ट्रांसलेशन इन द अरब वर्ल्ड’ जैसे विषयों पर गहराई से चर्चा की गई। क्या अनुवाद के माध्यम से हम अन्य सभ्यताओं के दर्शन को अधिक सटीकता से समझ सकते हैं? यह आयोजन अरब दुनिया की बौद्धिक भूमिका को वैश्विक स्तर पर पुनः स्थापित करने का एक प्रयास था। क्या सांस्कृतिक अनुवाद भविष्य के अंतरराष्ट्रीय संबंधों को नया आकार दे सकता है?
विज्ञप्ति में इस संगोष्ठी के बाद के आगामी कार्यक्रमों या किसी विशिष्ट वित्तीय विवरण का उल्लेख नहीं किया गया है।
यह संगोष्ठी किस पुस्तक के संदर्भ में आयोजित की गई थी? यह संगोष्ठी Routledge द्वारा हाल ही में प्रकाशित ‘Translating Cultures in the Arab World: New Histories and Geographies’ नामक पुस्तक के लॉन्च कार्यक्रमों की श्रृंखला का हिस्सा थी। इसे लिटरेचर, पब्लिशिंग एंड ट्रांसलेशन कमीशन द्वारा समर्थित किया गया था।
दूसरे संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य क्या था? इसका उद्देश्य अरब और भूमध्यसागरीय दुनिया में अनुवाद के सांस्कृतिक प्रक्षेपवक्रों का पता लगाना और उन ऐतिहासिक क्षणों की खोज करना था जहाँ अनुवाद ने ज्ञान के प्रसार और बौद्धिक विनिमय में योगदान दिया। इसने अरब दुनिया को ज्ञान के उत्पादक स्थल के रूप में प्रस्तुत किया।
पहले और दूसरे संगोष्ठी के बीच क्या अंतर था? पहला संगोष्ठी 21 सितंबर को हुआ था, जिसमें फिलोलॉजी, भाषाई विविधता और भाषा न्याय जैसे वैचारिक प्रश्नों पर चर्चा हुई थी। दूसरा संगोष्ठी इन अवधारणाओं से आगे बढ़कर अनुवाद के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक प्रक्षेपवक्रों पर केंद्रित था।